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साल दर साल घटते जलस्तर को देखते हुए हमने क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर के तहत अंडर ग्राउंड पाइप लाइन पर 2016 में अंतर्राष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र, मेक्सिको एवं केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल के संयुक्त तत्वाधान में हरियाणा के करनाल जिले में काम शुरू किया।

इसे पहले ड्रिप का उपयोग सब्ज़ी एवं बागवानी वाली फसलों में ही किया जा रहा है। हमारे देश में कई जगह भूमि की सतह पर ड्रिप लाइन बिछाकर खेती की जा रही हैं, लेकिन इन पाइप लाइनों को फसल की बुवाई के समय एवं कटाई के समय निकालने की जरूरत पड़ती है जिससे हर बार 10 से 15% का नुकसान भी होता है एवं धूप से यह पाइपलाइन ने जल्दी ही खराब हो जाती है

इसलिए हमने ड्रिप लाइनों को भूमि में 15 से 20 सेंटीमीटर की गहराई पर दबाया, यह गहराई मिट्टी के प्रकार के अनुसार कम हो ज्यादा की जा सकती है। ड्रिप लाइनों को भूमि के अंदर दबाने से फायदा यह हुआ कि हर बार ड्रिप लाइनों को खेत से बाहर निकालने की जरूरत नहीं पड़ी एवं लाइनों की लाइफ कई सालों तक बढ़ गई।

भूमि में दबाई गई यह लाइनें 10 से 15 साल तक खराब नहीं होती है।हमारे इस परीक्षण को 3 साल पूरे हो गए हैं एवं हमने सफलतापूर्वक धान मक्का गेहूं एवं मूंग की फसल उगा चुके हैं हम समझते हैं कि आने वाले समय के लिए यह तकनीकी एक वरदान साबित होगी एवं हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ संसाधन संरक्षित भी कर सकेगी जो की खेती के लिए बहुत उपयोगी है।

 

 



Solidaridad India 31 May 2020





आदरणीय सरपंच महोदय

नमस्कार

यह सन्देश आपको सॉलीडैरीडैड के द्वारा दिया जा रहा है

आज हम आपको करोना संक्रमण से बचाने के लिए मास्क पहनने की उपयोगिता के बारे में बताने जा रहे हैं

ऐसा देखने में आया है कि हमारे बीच में ही ऐसे लोग हैं

  1. जो मास्क नहीं पहनते
  2. जिन्हे मास्क मुसीबत लगता है
  3. बोलते समय मास्क नीचे करके बात करते हैं
  4. मास्क लगाने से जिनकी बॉडी में तथाकथित तौर पर ऑक्सीजन लेवल कम हो जाता है
  5. मास्क चेहरे पर अच्छा नहीं लगता
  6. जेब  में रखते हैं
  7. दूसरा व्यक्ति जो मास्क लगाये हो वो ड़रपोक और जाने क्या क्या  लगता है, आदि आदि

किसान भाइयों भारत के प्रख्यात साइंस फिक्शन राइटर डॉ अरविन्द मिश्रा अपने ब्लॉग के माध्यम से बताते हैं कि  विश्व प्रसिद्ध शोध जर्नल साईंस के ताजे अंक में किम्बर्ले ए प्रैथर और साथियों का एक शोधपत्र प्रकाशित हुआ है जिसमें मास्क पहनने के मुद्दे पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

इस शोधपत्र का निष्कर्ष है कि तमाम लक्षणविहीन संक्रमणधारी लोगों से बचने का एक ही तरीका है - मास्क पहना जाय

जिससे छींक या खासी के प्रवाह के अपेक्षाकृत बड़े कणों - ड्रापलेट और फुहारों - एरोसोल्स के जरिये वायरस के प्रसार पर नियंत्रण हो सके।

नये शोध यह बताते हैं कि ज्यादातर कोविड - 19 के संक्रमण संक्रमित किन्तु लक्षणविहीन रोगियों के सांस लेने, बोलने या खांसने छींकने से निकलने वाली फुहारों से हो रहे हैं जो हवा में लम्बे समय तक बने रह रहे हैं।

ये वायरस युक्त फुहारें यानि एरोजोल बन्द कमरों /स्थानों में इकट्ठे होकर हवा में घंटों रह सकते हैं और सांस लेने के वक्त सीधे फेफड़ों की गहराई में उतर सकते हैं। इसके प्रभावी रोकथाम में मास्क की भूमिका अहम है। जांच से लक्षणविहीन संक्रमणधारियों की पहचान और उन्हें स्वस्थ लोगों से अलग थलग - क्वैरेन्टीन करना भी उतना ही जरुरी है

मनुष्य के श्वसन क्रिया में 0.1 माइक्रोमीटर से 1000 माइक्रोमीटर तक के तरल कण - ड्रापलेट निकलते हैं। यह इनके आकार, जड़त्व, गुरुत्वाकर्षण और सूखने (इवापोरेशन) पर निर्भर करता है कि ये हवा में कितनी दूर तक जा सकते हैं।

बड़े कण हवा में दूर जाने या शीघ्र सूखने के बजाय जल्द ही बिना अधिक दूर गये दो मीटर के भीतर ही गुरुत्वाकर्षण के कारण जमीन पर आ गिरते हैं। ये आस पास की सतहों, सामानों (फोमाईट्स) को संक्रमित करते हैं और इनके सम्पर्क में आने वालों में फैल जाते हैं।

किन्तु पांच माइक्रोमीटर के आस पास के हल्के कणों - एरोसोल्स के साथ वायरस हवा के जरिये दूर तक जा सकते हैं। हवा बहने की दिशा में काफी दूर तक जा सकते हैं, देर तक रह सकते हैं।

इस तरह सार्स सीओवी 2 के वायरस के फैलने और मानव संक्रमण के दो जरिये हैं। एक तो संपर्क ( सीधा या अप्रत्यक्ष लोगों के बीच और संक्रमित सतह या वस्तुओं के जरिये) या फिर संक्रमित हवा में सांस लेने से।

नयी महामारी के वायरस हवा के जरिये सीधे श्वसन तंत्र से होते हुये फेफड़ों के एल्वेओलर रीजन तक जा पहुंच रहे हैं। ऐसे में वे शरीर की रोग प्रतिरोधी प्रणाली को भी टेम्पररी तौर पर मात दे रहे हैं। सार्स - सीओवी - 2 अपने पहले के साथी सार्स - सीओवी - 1 की तुलना में तीन गुना अधिक तेजी से वृद्धि करता है।

जिससे वह बहुत तीव्रता से श्वांस नली (फैरिंक्स) तक जा पहुंचता है। तब तक संक्रमण के लक्षण भी नहीं उभरे होते। इसके बाद प्रतिरोधक प्रणाली सक्रिय होती है मगर तब तक काफी देर हो चुकी रहती है।लक्षण प्रगट होने के पहले ही ऐसे रोगी दूसरों को संक्रमित कर चुके रहते हैं। ये  "मौनी संक्रमणधारी" महामारी को फैलाने में अधिक जिम्मेवार हैं।

इस वायरस की जन्मस्थली वुहान, चीन में ऐसे मौनी संक्रमणधारी कुल संक्रमणों के 79 फीसदी पाये गये थे। यहीं लक्षणविहीन मौनी संक्रमणधारियों की जांच से पहचान और उन्हें क्वैरेन्टीन करने की जरुरत समझी जा रही है।

वुहान में ही भीड़भाड़ वाली जगहों - अस्पतालों में एरोसोल में वायरस की उपस्थिति अधिक पायी गयी थी। और यह लोगों में छह फुट तक की भी दूरी से दूर तक फैलाव में थी। संक्रमितों में एक मिनट तक तेज बातचीत करने में 1000 से ज्यादा वायरस युक्त एरोसोल्स पाया गया।

सुपर संक्रमणधारी तो अपने तेज स्वर में बात करने से एक मिनट में एक लाख तक वायरस प्रवाहित कर सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने छह फीट की न्यूनतम दूरी और हथेलियों की निरन्तर सफाई से संक्रमण से बचने की जो युक्ति बताई है वह 1930 में वायरस संक्रमण पर एक शोध के मुताबिक है।

उस अध्ययन में पाया गया था कि 100 माइक्रोमीटर तक के ड्रापलेट जो खांसी और छींक से बाहर आते हैं वे गुरुत्वाकर्षण से कम दूरी पर ही नीचे जा गिरते हैं। उस समय महीन कणों - सब माइक्रान को मापने की तकनीक नहीं थी।

मगर अब यह देखा जा चुका है कि रुकी हुई हवा में 100 माइक्रोमीटर के कण तो अधिकतम आठ फीट तक जा सकते हैं और और 4.6 सेकेन्ड में जमीन या किसी सतह पर गिर जाते हैं। मगर मात्र एक माइक्रोमीटर के एरोसोल हवा में 12.4 घंटे बने रह सकते हैं।

इसलिये विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कि छह फीट की सिफारिश बन्द भवनों या कमरों के लिए उपयुक्त नहीं है।

बाहर के वातावरण में भी एरोजोल के जरिये संक्रमण की संभावना कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे एरोसोल्स में वायरस लोड, बहने वाली हवा की गति जो वायरस को लम्बी दूरियों तक ले जा सकती है।

यही सबसे डरावना पहलू है। मौनी संक्रमणधारी टहलते या तेज कदमों से चलते, दौड़ते वक्त वायरस हवा में छोड़ सकते हैं जो लम्बे समय तक तैरता रह सकता है।

अगर हवा प्रदूषित हुई तो वायरस पार्टिक्युलेट मैटर्स - कणों या धूल पर भी ठहर सकते हैं, लम्बी दूरी तक विसर्जित हो सकते हैं। यह देखा भी गया है कि अधिक प्रदूषण वाले जगहों में संक्रमण भी घातक हो रहे हैं।

इन सभी कारणों से मास्क का पहनना संक्रमण से बचने का कारगर तरीका है। खास तौर पर अस्पतालों, हेल्थ केयर सेन्टर, हवाई जहाज, रेस्तरां, और दवा की दुकानों या भीड़भाड़ की अन्य जगहों पर मास्क जरुरु पहनिये काम पर चलिये ।

ताईवान, हांगकांग, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया ने बिना लाकडाऊन के ही केवल मास्क पहनने को अनिवार्य करके संक्रमण के फैलाव और मौतों पर नियंत्रण पा लिया है |

सरपंच महोदय आज हम आपसे एक विशेष निवेदन करने जा रहे हैं

जैसा कि आप जानते हैं कि सॉलीडैरिडैड संस्था 21 अप्रैल 2020 से आपको करोना वायरस एवम खेती बाड़ी से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां आपके मोबाइल फ़ोन के माध्यम से उपलब्ध करवा रही है।

आपसे सविनय निवेदन है कि आप अपनी पंचायत के लेटरहेड पर हमें पत्र लिख कर  अपनी प्रतिक्रिया दें ताकि हमें आपके मन की बात भी पता चल सके। इस पत्र में आप यह बता सकते हैं कि आपको यह सेवा कैसी लगी और आपको इससे क्या लाभ हुआ,आपने इस सूचनाओं अपने पंचायत क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों को उपलब्ध कराया।

इन सूचनाओं का आपके जीवन मे क्या महत्व है। इसके अलावा आप हमें अपने सुझावों से भी अवगत करवा सकते हैं। पत्र पर अपनी ग्राम पंचायत की मुहर अवश्य लगाएं।

आप अपने पत्र लिख कर उसका एक साफ फोटो स्कैन करके या खींच कर   कर 9992220655 पर व्हाट्स एप्प के माध्यम से भेज दें।

कृपया साफ़ अपने पत्र की साफ़ पढ़े जा सकने वाली फोटो ही भेजें।

इसकी पत्र को ओरिजिनल प्रति नीचे बताये गये पते पर डाक या कोरियर से भी भेज देवें |

धन्यवाद,

महा प्रबंधक

सॉलीडैरीडैड A-5 पहली मंजिल

शंकर गार्डन,विकासपुरी

नई दिल्ली

सॉलीडैरीडैड की ओर से आपका धन्यवाद   







आदरणीय सरपंच महोदय

नमस्कार 

यह सन्देश आपको सॉलीडैरीडैड और विप्पी इंडस्ट्रीज लिमिटेड देवास के द्वारा दिया जा रहा है | 

आज हम आपको गोबर की खाद के उपयोग के सही समय व तरीके की जानकारी देने जा रहे हैं 

गोबर की खाद का उपयोग व सही समय जमीन की उपजाऊ क्षमता जीवाणुओं की मात्राक्रियाशीलता पर निर्भर करती है

क्योंकि बहुत सी रासायनिक क्रियाओं के लिए सूक्ष्म जीव बहुत ही आवश्यक होते हैं इन जीवाणुओं का भोजन मुख्यत: कार्बनिक पदार्थ ही होते हैं इनकी अधिकता से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर प्रभाव पड़ता है

केवल जैविक खाद और जैसे गोबर की खाद, हरी खाद, जीवाणु खाद इनके द्वारा ही मुख्य  रूप से मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकता है

आजकल गोबर की खाद का उपयोग कम हो गया है यदि कोई कर भी रहा है तो बहुत कम मात्रा में और इसे खेत में डालने का समय भी उचित नहीं है

सामान्यता किसान भाई अप्रैल-मई में जब बहुत गर्मी होती है तो गोबर की खाद खेत में डालने लगते हैं जो कि सही समय नहीं है

इस समय गर्मी में तापमान बहुत अधिक होता है इतने अधिक तापमान में गोबर की खाद में उपस्थित सूक्ष्मजीव नष्ट होने लगते हैं

गोबर की खाद डालने का मुख्य उद्देश्य भूमि में उपस्थित सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता को बढ़ाना है

सूक्ष्म जीव हमारे खेत के उपजाऊपन को बनाए रखने में बहुत सहायक होते हैं

अतः किसान भाइयों गोबर की खाद को हमें बहुत अधिक तापमान या गर्मी के समय खेत में नहीं डालना चाहिए ताकि उपस्थित सूक्ष्म जीव नष्ट ना हो

गोबर की खाद का उपयोग जून के महीने में जब हल्की ठंडी हवाएं चलने लगे तब इसका उपयोग हमें करना चाहिए

कई स्थानों पर गोबर की खाद ले जाने में किसान भाइयों को समस्या होती है इस समस्या के समाधान के लिए किसान भाई खाद को खेत में ढेर लगा सकते हैं और इसे ढक दें

जब वर्षा पूर्व की ठंडी हवा चलने  लगती है तो गोबर की खाद को खेत में फैला देना चाहिए इसके बाद एक जुताई करके खेत में मिला दे बहुत अधिक तापमान में गोबर की खाद का उपयोग नहीं करना चाहिए

इसके साथ ही यह ध्यान देना चाहिए कि गोबर की पकी  हुई खाद का ही प्रयोग करें कच्ची अधपकी   गोबर की खाद का उपयोग नहीं करना चाहिए

कच्ची पक्की खाद डालने से खेत में कई प्रकार के कीड़ों का प्रकोप हो जाता है जैसे दीमक, व्हाइट ग्रब, सफेद लट जो कि  खेतों में नुकसान पहुंचाते हैं

गोबर खाद के अन्य विकल्प जैसे वर्मी कंपोस्ट, विस्तरा खाद, नाडेप आदि का उपयोग लाभप्रद रहता है जो कम समय में तैयार भी हो जाते हैं

समृद्ध खेती प्रोग्राम आपसे अपील करता है कि गोबर की खाद का प्रयोग जब हल्की ठंडी हवाएं चलने लगे तो ही करें समृद्ध खेती प्रोग्राम की ओर से सभी किसानों का और सभी सहयोगियों का बहुत-बहुत धन्यवाद

सरपंच महोदय आपसे निवेदन है कि आपके फोन के मैसेज बॉक्स में हमने जो लिंक भेजा है उसे कृपया आप अपने स्थानीय व्हाट्स एप्प ग्रुप में शेयर कर दें ताकि आपके माध्यम से यह महत्वपूर्ण सूचनाये आपके क्षेत्र में जन जन तक पहुँच कर आम जन को लाभान्वित करें

यदि आप स्वयं कोई स्थानीय व्हाट्सएप्प ग्रुप चलाते हैं तो हमारे कार्यालय के मोबाइल नंबर 9992220655 को उसमें शामिल कर लें हम आपके व्हाट्स एप्प ग्रुप में खेती बाड़ी , पशुपालन से जुडी जनोपयोगी सूचनाएं भेजेंगे जिससे आपके पंचायत क्षेत्र में आमजन को लाभ होगा |

हम आपको जो सन्देश उपलब्ध करवा रहे हैं आपको यह सन्देश कैसे लग रहे हैं इसके बारे में भी आप अपनी प्रतिक्रिया हमारे कार्यालय के ऊपर बताये हए नंबर पर व्हाट्सएप्प के माध्यम से भेज सकते हैं |

सॉलीडैरीडैड और विप्पी इंडस्ट्रीज लिमिटेड देवास की   ओर से आपका हार्दिक धन्यवाद

 



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आदरणीय सरपंच महोदय

नमस्कार

यह सन्देश आपको सॉलीडैरीडैड और विप्पी इंडस्ट्रीज लिमिटेड देवास  के द्वारा दिया जा रहा है

आज हम आपको सोयाबीन फसल की सस्य क्रियाओं के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं

खेत की तैयारी

कम से कम 3 वर्ष में एक बार खेत की गहरी जुताई 20 से 30 सेंटीमीटर कर मृदा को गर्मी की धूप लगने के लिए छोड़ दें

इससे तेज धूप में खरपतवार कीट, व्याधि व पोषण के प्रबंधन में सहायता मिलती है साथ ही वर्षा के जल को भूमि में समाहित कर संचय करने में सुविधा होती है

वर्षा के आगमन होने पर सोयाबीन की बौवनी हेतु खेत की तैयारी के लिए कल्टीवेटर को विपरीत दिशा में दो बार चलाने के पश्चात पाटा लगा कर कर खेत को समतल कर दें

यदि खरपतवार प्रबंधन हेतु चयनित बौवनी पूर्व खरपतवारनाशक फ्लूक्लोरालीन अथवा ट्राईफ्लूरालीन का उपयोग करना हो तो इस समय उसका छिड़काव कर भूमि में अच्छी तरह से मिला दे

ध्यान रहे कि इनके उपयोग के समय भूमि में नमी हो तथा बौवनी के कई दिन पहले सूखे खेत में इसका प्रयोग नहीं करें

उत्पादन में निरंतरता टिकाऊपन  लाने हेतु यह आवश्यक है कि गोबर या अन्य कार्बनिक खाद को रसायनिक उर्वरकों के साथ उपयोग में लाया जाए

अत: अंतिम बखरनी के पूर्व पूर्णत: पकी हुई गोबर की खाद 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर मुर्गी की ढाई टन प्रति हेक्टेयर की दर से फैला दें एवं पाटा चला कर समतल कर दें

अगर गोबर की खाद की उपलब्धता सीमित हो तो खेत को भागों में बांटकर बारी-बारी से डालें डालें

किसानों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले चयनियत उर्वरकों में   सुपरफास्ट का समावेश नहीं होने की स्थिति में गोबर की खाद डालते समय 15 से 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिप्सम मिलाकर मिलाकर खेत में फैला दें

विगत कुछ वर्षों में सोयाबीन की फसल पर आई मौसम की विषम परिस्थिति जैसी वर्षा की अनिश्चितता मानसून का विलम्ब से आगमन, अधिक अंतराल के सूखे की समस्या आदि को देखते हुए की अनुशंसा की जाती है कि सोयाबीन की बोवनी ब्रॉडबैंड फ़रो या रिज पद्दति से ही करें जिससे सोयाबीन का उत्पादन प्रभावित ना हो

इस भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित बीबीएफसी ड्रिल एवं प्रोसीड सोयाबीन की बोनी हेतु उपयोग करें

उपयुक्त किस्मों का चयन

सोयाबीन उत्पादन में स्थिरता लाने तथा प्रतिकूल परिस्थिति में में होने वाली संभावित हानि को कम करने हेतु अनुशंसा की जाती है कि  हमेशा 3 से 4 किस्मों की खेती की जाए  इससे बुवाई कटाई बने सबसे क्रियाओं में पर्याप्त समय मिलता है तथा फसल प्रबंधन संतोषजनक होता है कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम होता है

किस्मों की पकने की अवधि भिन्न भिन्न होने से कटाई में भी सुविधा होती है तथा फलियों के चटकने से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है

मध्य क्षेत्र के लिए उपयुक्त व अनुशंसित सोयाबीन की प्रमुख किस्मे जे.एस.20-34, जे.एस. 20-29, जे.एस.20-69, आर.वी.एस. 2001-4, जे.एस. 93-05,  जे.एस 95-60, जे एस 97-52 एनआरसी 7, एनआरसी 37 एनआरसी 86 आदि

किसानों को सलाह है कि अपने पास उपलब्ध खरीदे गए सोयाबीन के बीज का बौवानी से पढ़ले अंकुरण परीक्षण कर यह पता कर लेना चाहिए कि अंकुरण न्यूनतम 70% है या नहीं

इस परीक्षण हेतु 10 गुना 10 मीटर की क्यारी बनाकर बनाकर बनाकर कतारों में 43 सेंटीमीटर की दूरी पर 100 बीज बोयें तथा अंकुरण के पश्चात निकले हुए पौधों की संख्या को गिन लें

यदि 100 में से 70 से अधिक पौधे अंकुरित हो तो बीज उत्तम है अंकुरण क्षमता का परीक्षण थाली में गीला अखबार रखकर अथवा गीले थैले पर बीज उगा कर कर भी किया जा सकता है

बीजोपचार

विभिन्न रोगों विशेषत: फफूंद जनित बीमारियों से सोयाबीन के बचाव हेतु भूमि से पहले सोयाबीन के बीज को 2 ग्राम थाईरम  एवं 1 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने की अनुशंसा है

इसके स्थान पर किसान भाई मिश्रित बीज उपचार हेतु जैविक फफूंद नाशक ट्राईकोडरमा विरडी आठ से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज का उपयोग भी कर सकते हैं

इन कवकनाशियों द्वारा बीजोपचार के पश्चात ही जैविक  खाद जैसे ब्रेडीराईजोबियम कल्चर एवं पी सी बी कल्चर दोनों को प्रत्येक की 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर तुरंत बौवनी हेतु उपयोग करना चाहिए

अपरम्परागत या नये क्षेत्रो में सोयाबीन की खेती शुरू करने की स्थिति में जैविक खाद की मात्रा दुगनी से तिगुनी 10 से 15 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए

किसान भाई यह विशेष ध्यान रखें कि कवकनाशी द्वारा बीज उपचार के बाद ही जैविक कल्चर खाद द्वारा बीज उपचार करना चाहिए

उपयुक्त जैविक कल्चर को बौवानी के समय पर विश्वसनीय स्त्रोत से ही प्राप्त कर ठंडी जगह पर रखें

पीला मौजेक बिमारी एवं तना मक्खी का प्रकोप प्रत्येक वर्ष होने वाले क्षेत्रों में थायोमिथाक्स्म 30 ऍफ़.एस. यानि 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से या इमिड़ाक्लोरपिड 48 ऍफ़.एस. यानि 1.25 मि.ली. प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करने की अनुशंसा की जाती है

बोवनी

बोवनी साधारणतया सोयाबीन की बोवनी हेतु जून महीने की आखिरी सप्ताह से जुलाई महीने के पहले सप्ताह का समय उचित है लेकिन बोवनी से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि कि जमीन में पर्याप्त नमी है

अतः मानसून के आगमन के पश्चात लगभग 10 सेंटीमीटर वर्षा होने के पश्चात ही बनी करें जिससे अंकुरित पौधों के विकास के लिए जमीन में पर्याप्त नमी हो जाती है

चयनित सोयाबीन की किस्म के बीज का अंकुरण परीक्षण न्यूनतम 70% तथा बीज उपचार करने के पश्चात ही भोगनी हेतु उपयोग करें सोयाबीन की बोनी 45 सेंटीमीटर लाइन की दूरी पर दुफन तिफन  ट्रैक्टर चालित बीबीए फरो  सीड ड्रिल  का उपयोग का उपयोग फल का उपयोग का उपयोग करते हुए बीज को 3 सेंटीमीटर की गहराई पर करें तथा पौधे से पौधे की दूरी 4 से 5 सेंटीमीटर रखें

मानसून की देरी के कारण के कारण भूमि में विलंब होने की स्थिति में जल्दी पकने वाली किस्मों का उपयोग करें एवं लाइन से लाइन की दूरी घटाकर 30 सेंटीमीटर रखें तथा बीज दर बढ़ाकर बौवनी  करें

बीज दर

मध्यम आकार के दाने वाली सोयाबीन की किस्में जैसे जे.एस. 20 – 29, जे.एस. 20-69 के लिए बीज दर 60 से 65 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

बड़े आकार के दानों वाली किस्में जैसे जे.एस. 20-34 जे.एस. 95 - 60 एन.आर.सी. 7 आदि के लिए बीज दर दर लगभग 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखें

अच्छे अंकुरण वाली छोटे दाने वाली तथा फैलने वाली किस्में जैसे एन.आर.सी 37, जे.एस. 97-52 के लिए 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर पर्याप्त होती है

अंतरवर्तीय फसलों का प्रयोग

सोयाबीन की अंतरवर्तीय  फसल के रूप में उगाना अधिक लाभकारी है ऐसे क्षेत्रों में जहां रबी की फसल लेना संभव नहीं हो वहां सोयाबीन और अरहर की खेती करें

इस हेतु अरहर की जल्दी पकने वाली किस्में अरहर की जल्दी पकने वाली किस्में जल्दी पकने वाली किस्में उत्तम पाई गई हैं

सिंचित क्षेत्रों में सोयाबीन के साथ मक्का ज्वार कपास आदि अंतरवर्तीय फसलों की काश्त करें

इसके 4:2 या 2:2 के अनुपात में सोयाबीन व् अंतरवर्तीय फसल 30 सेंटीमीटर की लाइन से लाइन की दूरी पर बौवनी  करें

इसी प्रकार फल बागों के बीच की खाली जगह में भी सोयाबीन की खेती की जा सकती है

अंतरवर्तीय फसलों की बोवनी हेतु ट्रैक्टर चालित अंतरवर्तीय  सीड ड्रिल मशीन का उपयोग किया जा सकता है

जल प्रबंधन

खरीफ मौसम में उचित समय पर वर्षा न  होने या वर्षा का वितरण असामान्य होने पर अथवा सितंबर माह में वर्षा का अंतराल अधिक होने पर सोयाबीन में सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है

पानी/नमी की कमी का सोयाबीन उत्पादकता पर सबसे विपरीत प्रभाव फलियों में दाने भरने की अवस्था में पड़ता है अतः इस समय पानी नमी की कमी नहीं होने देना चाहिए

बीजांकुर  अवस्था, फूल आने की अवस्था अथवा दाना भरने की समय वर्षा का अंतराल लंबा होने की स्थिति में उपलब्धता अनुसार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए

कटाई एवं गहाई

फसल की कटाई उपयुक्त समय पर करने से फसलों के चटकने पर दाने बिखरने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है

फलियों का रंग बदलने या पूर्णतया समाप्त पीला भूरा अथवा काला होने पर यह मान लें कि फलियां परिपक्व हो चुकी हैं इस अवस्था में पकी हुई फलियों के दाने में नमी 14 से 16 प्रतिशत हो जाए तो सोयाबीन की कटाई  करनी चाहिए

कटी हुई फसल को 2 से 3 से 3 दिन दिन धूप में सुखा  कर कर थ्रेसर से धीमी गति 350 से 400 आरपीएम पर गहाई करनी चाहिए

थ्रेशर  की गति में कमी लाने हेतु बड़ी पुली का उपयोग करें तथा इस बात का ध्यान रखें कि गहाई  समय बीज का छिलका न उतरे एवं बीच में दरार ना पड़े  

भंडारण

गहाई के पश्चात बीज को 3 से 4 दिन तक धूप में अच्छा सुखा कर भंडारण करना चाहिए इस समय बीज में नमी का प्रतिशत 10% तक होना हितकर है

भंडारण गृह ठंडा का बाजार एवं कीट रहित होना चाहिए

बीज को बोरियों में भरकर 3 से 4 बोरियों से अधिक एक के ऊपर एक नहीं रखनी चाहिए

सोयाबीन के बीजों को बोरो को भंडारगृह में उठाते समय  समय ऊंचाई से ना पटकें  इससे बीजों के अंकुरण क्षमता पर भी पड़ता है

बोरों को भण्डारगृह में सीधा खड़ा करके रखने की व्यवस्था करें

सरपंच महोदय आपसे निवेदन है कि आपके फोन के मैसेज बॉक्स में हमने जो लिंक भेजा है उसे कृपया आप अपने स्थानीय व्हाट्स एप्प ग्रुप में शेयर कर दें ताकि आपके माध्यम से यह महत्वपूर्ण सूचनाये आपके क्षेत्र में जन जन तक पहुँच कर आम जन को लाभान्वित करें

यदि आप स्वयं कोई स्थानीय व्हाट्सएप्प ग्रुप चलाते हैं तो हमारे कार्यालय के मोबाइल नंबर 9992220655 को उसमें शामिल कर लें हम आपके व्हाट्स एप्प ग्रुप में खेती बाड़ी , पशुपालन से जुडी जनोपयोगी सूचनाएं भेजेंगे जिससे आपके पंचायत क्षेत्र में आमजन को लाभ होगा |

हम आपको जो सन्देश उपलब्ध करवा रहे हैं आपको यह सन्देश कैसे लग रहे हैं इसके बारे में भी आप अपनी प्रतिक्रिया हमारे कार्यालय के ऊपर बताये हए नंबर पर व्हाट्सएप्प के माध्यम से भेज सकते हैं |

सॉलीडैरीडैड और विप्पी इंडस्ट्रीज लिमिटेड देवास की   ओर से आपका हार्दिक धन्यवाद







आदरणीय सरपंच महोदय

नमस्कार

यह सन्देश आपको सॉलीडैरीडैड और वोडाफोन इंडिया फाउंडेशन  की ओर से दिया जा रहा है

आज हम आपको सोयाबीन की फसल में में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन कैसे करें के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं

किसान भाइयों संतुलित पोषण प्रबंधन का अर्थ है सर्वोत्तम उत्पादकता के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा, स्त्रोत, समय और स्थान का प्रबंधन करना

उचित पोषण प्रबंधन करने से फसल में अनेक लाभ मिलते हैं

जैसे ऊपज और उसकी गुणवत्ता बढ़ जाती है

मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार करने में मदद मिलती है

मिट्टी के अंदर पोषक तत्वों की कमी में सुधार होता है और मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर और लम्बे समय तक  बनाए रखने में मदद मिलती है

सोयाबीन में सही पोषण प्रबंधन कैसे करें

किसान भाइयों सबसे पहले ध्यान रखें की खाद उर्वरकों का प्रयोग करने से पहले मिट्टी का परीक्षण अवश्य करा लें

संतुलित उर्वरक प्रबंधन के अंतर्गत रसायनिक उर्वरकों का उपयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही किया जाना सर्वथा उचित होता है

राज्य कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश की गई संतुलित मात्रा मिटटी परीक्षण की रिपोर्ट के अनुसार घटाई व बढ़ाई जा सकती है

उर्वरकों का प्रयोग सही समय, सही विधि और सही साधन से करें

बुवाई पूर्व खेती की तैयारी के समय उर्वरक प्रयोग

अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 10 टन प्रति हेक्टेयर का उपयोग करें

देसी गोबर खाद 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर या मुर्गी विष्ठा खाद ढाई टन प्रति हेक्टेयर के साथ अनुशंसित उर्वरक की  संतुलित मात्रा ( एन : पी : के) देने से उचित उत्पादन प्राप्त होता है

हरित खाद 4 से 5 टन प्रति हेक्टेयर जैव घटक भूमि को प्राप्त होते हैं

जैव उर्वरक के रूप में पञ्चगव्य , अमृत पानी , जीवामृत , विस्तरा खाद या बीजामृत का प्रयोग करें

यदि केंचुआ खाद उपलब्ध हो तो 2.5 से 4.0 टन प्रति हेक्टेयर खेत की मिटटी में मिलाएं

सोयाबीन की फसल में उर्वरकों को आधार डोज के रूप में देने की अनुशंसा की जाती है जिसकी अनुशंसित मात्राएँ इस प्रकार हैं N:P:K:S- 25:60:40:20 (नत्रजन : स्फुर : पोटाश : सल्फर ) जिसकी आपूर्ति करने के लिए 56 किलो यूरिया के साथ 375 किलो सिंगल सुपर फास्फेट और 67 किलो म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की डोज डालनी चाहिए

यह मात्रा बुवाई से 15 से 20 दिन पहले खेत की तैयारी करते समय खेत में अंतिम जुताई से पूर्व डाल कर भली भांति मिटटी में मिला देवें

उर्वरक का प्रयोग करने से पूर्व किसान भाई चार सूत्र याद रखें

  1. सही स्त्रोत
  2. सही मात्रा
  3. सही जगह
  4. सही समय

सोयाबीन फसल में उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा

विकल्प -1

नाईट्रोजन - 25

उर्वरक का नाम : यूरिया (56 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 22 किलो / एकड़)  

फास्फोरस – 60

उर्वरक का नाम : सिंगल सुएर फास्फेट (375 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 150 किलो / एकड़) 

पोटाश - 40

उर्वरक का नाम : म्यूरेट ऑफ़ पोटाश  (67 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 27 किलो / एकड़) 

 

विकल्प -2

उर्वरक का नाम : डी ए पी (130 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 52 किलो / एकड़) 

उर्वरक का नाम : म्यूरेट ऑफ़ पोटाश  (67 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 27 किलो / एकड़) 

उर्वरक का नाम : जिप्सम (200 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 80 किलो / एकड़) 

 

विकल्प - 3

उर्वरक का नाम : एन पी के (12:32:16) (200 से 250 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 80 से 100 किलो / एकड़) 

उर्वरक का नाम : जिप्सम (200 किलोग्राम/ हेक्टेयर या 80 किलो / एकड़) 

 

जस्ता एवं गंधक की पूर्ती

अनुशंसित खाद एवं उर्वरक की मात्रा के साथ 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर मिटटी परिक्षण के रिपोर्ट के आधार पर डालें

गंधक युक्त उर्वरक (सिंगल सुपर फास्फेट) का उपयोग अधिक लाभकारी होगा

सुपर फास्फेट का उपयोग ना कर पाने की दशा में जिप्सम  का उपयोग 200 किलोग्राम प्रति हेक्टयेर की दर से करना लाभकारी है, इसके साथ ही गंधक युक्त उर्वरको का उपयोग किया जा सकता है

 

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किसान भाइयों ! जैसा कि आप जानतें हैं टिड्डी दल का प्रकोप होने की सूचनाएं लगातार मिल रही हैं विशेषकर राजस्थान से लगे नीमच जिले सिंगरौली तहसील क्षेत्र , अगर-मालवा के साथ शाजापुर, उज्जैन जिले के कुछ क्षेत्र में टिड्डियों को देखा गया है जो खेतों में लगी हुई फसलों एवं वनस्पतियों को खाकर नष्ट कर रहा है |

आइये अब आपको बताते हैं टिड्डी दलों की टिड्डी दल को कैसे ढूंढा जाए?

टिड्डियों का झुंड दिन के दौरान उड़ता रहता है और शाम होने पर पेड़ों पर, झाड़ियों में, फसलों इत्यादि में बसेरा करता है और वहां रात गुजारता है| फिर वे सुबह होने पर सूरज उगने के बाद अपने बसेरे के स्थान से उठकर उड़ना शुरू कर देते हैं | इसलिए टिड्डियों के दलों की तालाश के सिलसिले में खासतौर पेड़ों और झाड़ियों वाले स्थानों कि जांच की जानी चाहिए |

आगे बात करते हैं रंगों के आधार पर टिड्डी की स्थिति की पहचान कैसे की जाती है?

युवा टिड्डियों के यह दल प्रारंभ में गुलाबी रंग के होते हैं और धीरे-धीरे वे धुंधले सलेटी अथवा भूरापन लिए हुए लाल रंग के हो जाते हैं | परिपक्वता कि स्थिति में पहुँचने पर वे पीले हो जाते हैं | शिशु-टिड्डी झुंडों के रूप में चलती है | पीली अथवा नारंगी शरीर-पृष्टिका लिए हुए उनकी आकृति गहरी काली होती है |

किसान भाइयों अब बात करते हैं कि सबसे ज्आयादा नुक्इसान करने वाले टिड्डी दल का रंग कैसा होता है

किसान भाईयों पीले रंग कि टिड्डी ही अंडे देने में सक्षम होती है, इसके लिए पीले रंग के टिड्डी दल के पड़ाव डालने पर पूरा ध्यान रखने कि आवश्यकता है, क्योंकि पड़ाव डालने के बाद टिड्डियाँ किसी भी समय अंडे देने शुरू कर देती है | अंडे देते समय दल का पड़ाव उसी स्थान पर 3-4 दिन तक रहता है और दल उड़ता नहीं है | किसान भाइयों को इस स्थिति का पूरा लाभ उठाना चाहिए | गुलाबी रंग कि टिड्डियों के दल का पड़ाव अधिक समय तक नहीं होता इसलिए इनके नियंत्रण हेतु तत्परता बहुत जरुरी है |

किसान भाइयों आपको बताते हैं कि टिड्डी दल का नियंत्रण कैसे किया जाए

मध्यप्रदेश शासन के किसान कल्याण एवं कृषि विभाग द्वारा जारी किये गये दिशा निर्देशों के अनुसार

टिड्डी दल के नियंत्रण के लिए जहाँ टिड्डियों ने अंडे दिए हैं उन स्थानों को खोदकर या पानी भरकर या जुताई कर अण्डों को शीघ्रता से नष्ट करें | टिड्डी कि पहली व दूसरी अवस्था के फाके चलने में समर्थ नहीं होते हैं | दूसरी अवस्था के बाद फाका झुंड बनाकर ठीक से चलना शुरू कर देते हैं और इनसे फसलों को नुक्सान होने कि संभावना हो जाती है | इसलिए टिड्डी दल के पड़ाव व अंडे देने का पूर्ण ध्यान रखें ताकि अंडे देने कि तिथि के आधार पर फाकों के निकलने का ध्यान रखा जा सके और तुरंत नियंत्रण किया जा सके |

तीसरी अवस्था व इसके बाद कि अवस्थाओं के फाकों को उनके बढ़ने वाली दिशा में खाईयां खोदकर नष्ट करें | खाई कि गहराई कम से कम ढाई फुट व चौड़ाई एक फुट होनी चाहिए |

टिड्डी दल को भगाने के लिए यह आवश्यक है कि नजदीकी स्थानों से प्राप्त सूचना के अनुसार पूर्व से ही ध्वनि विस्तार तंत्र जैसे मांदल , ढोलक , डी जे , ट्रेक्टर का सायलेंसर निकाल कर आवाज करना , खाली टीन के डिब्बे , थाली इत्यादि स्थानीय स्तर पर तैयार रखें जिससे कि सामूहिक प्रयास से उक्त ध्वनि विस्तारक यन्त्र का उपयोग करके टिड्डी दल को आसामन में उड़ते हुए नीचे ना उतरने दिया जाए

टिड्बडी दल की संख्या में कमी लाने के लिए रासायनिक दवा नियंत्रण की भी अनुशंसा की गयी है इसके लिए किसान भाई सुबह 3 से 5 बजे तक कीटनाशी दवाएं ट्रेक्टरचलित स्प्रे पंप द्वारा अपने खेतों में छिडकाव करें

दवाओं के नाम और मात्रा इस प्रकार हैं

क्लोरोपाइरीफास 20 ई.सी. 1200 मि.ली.

डेल्टामेथ्रिन 2.8 ई.सी. 600 मि.ली.

लेम्डासाइलोथिन 5 ई.सी. 400 मि.ली.

डाईफ्लूबिनज्यूरान 25 डब्ल्यू.टी. 240 ग्राम

इन सभी रासायनिक दवाओं में से कोई एक दवा जो उपलब्ध हो जाए को  प्रति हेक्टेयर 600 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें |

जब टिड्डी दल अंडे देने की स्थिति में हो तो इस स्थिति पूरा लाभ उठाना चाहिए, रात्रि के समय या सुबह 4 बजे के बीच रासायनिक कीटनाशी पाउडर मेलाथियान 5 प्रतिशत 20 कि.ग्रा. या फेनबिल्रेड 0.4 प्रतिशत 20-25 किग्रा. या क्यूनालफ़ॉस 1.5 बी.पी. 25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर कि दर से बुरकाव करें |

किसान भाईयों टिड्डी दल के आक्रमण के समय यदि कीटनाशी दवा उपलब्ध न हो तो ऐसी स्थिति में ट्रेक्टरचलित पॉवर स्प्रे के द्वारा तेज़ बौछार से भी भगाया जा सकता है |

किसान भाइयों कब हम आपको बताते हैं कि यदि आपको टिड्डी दल दिख जाए तो उसकी सूचना कहाँ कहाँ दी जा सकती है

किसान  भाइयों  टिड्डी दल के दिखाई देने पर उसकी सूचना 

निकटतम टिड्डी दल नियंत्रण कार्यालय

पुलिस थाना

राजस्व कार्यालय

ग्राम पंचायत

विधालय

डाकघर

कोई भी सरकारी कार्यालय

में जा कर दें ताकि राज्य सरकार के द्वारा टिड्डी दल के नियंत्रण हेतु यथासंभव  कदम तेजी से उठाये जा सकें 

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आज के इस एपिसोड में हम आपको भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इंदौर के द्वारा काली मिटटी के लिए विकसित किये गये रिज फ़र्टिलाइज़र और सीड ड्रिल नामक यंत्र के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं.

किसान भाइयों जैसा कि आप जानते हैं कि सोयाबीन की खेती में उर्वरक और बीज दोनों का बहुत महत्वपूर्ण रोल होता है. उर्वरक और बीज प्रत्येक को एक दूसरे से निश्चित गहराई/दूरी पर डाला जाए तो अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं.

  1. भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान खंडवा रोड इंदौर ने रिज फर्टिलाइजर और सीड ड्रिल नामक मशीन

    style="background-color:white">का विकास किया है, जिसकी मदद से किसान उपयुक्त गहराई/दूरी पर पर बीज तथा उर्वरक डालकर बोवाई कर सकता सकता है.

  2. इस मशीन को संचालित करने के लिए 55 पीटीओ हॉर्स पावर ट्रैक्टर की आवश्यकता होती है.
  3. इस मशीन के सहायता से मनचाही पंक्ति से पंक्ति की दूरी रखी जा सकती है
  4. इस मशीन द्वारा बोई गयी फसल में आवश्यकता अनुसार सिंचाई भी कर सकते हैं.
  5. इस मशीन में अतिरिक्त चैनल ओपनर विंग्स होती हैं जो चैनल एवं रिंग्स की ऊंचाई को घटाने बढ़ाने हेतु अतिरिक्त सुविधा प्रदान करती हैं
  6. इस मशीन के फ्रेम के पिछले हिस्से पर एक स्टेबलाइजर सिस्टम बनाया गया है जिससे चलते हुए  संतुलन बरकरार रहता है
  7. इस मशीन में बीज के आकार के अनुसार बीज ड्रॉपिंग  रोलर को बदलने की सुविधा भी दी गई है
  8. इस मशीन में पांच फलों ओपनर सहित 4 फरो ओपेनेर्स की सुविधा भी दी गई

किसान भाइयों आप इस यंत्र को भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, खंडवा रोड इंदौर से खरीद सकते हैं |

भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, खंडवा रोड इंदौर  में संपर्क करने के लिए टेलीफोन नम्बर इस प्रकार हैं

एस टी डी कोड 0731 और टेलीफोन नम्बर 2476188, 2478414

भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान में ईमेल भेज कर भी सम्पर्क किया जा सकता है

ईमेल भेजने का पता है  :-       soybean.director@icar.gov.in

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किसान भाइयों पिछले कुछ सालों में हम सबने विश्व स्तर पर हो रहे मौसम में बदलाव का अनुभव किया है 

आपको जानना चाहिए कि किस तरह के बदलाव हो रहे हैं और अपेक्षित है 

अब न तो समय पर वर्षा होती है और जब होती है तो विस्तृत रूप से सब जगह पर नहीं होती है.

पूरे मौसम में अक्सर लम्बे लम्बे अंतराल व वर्षा के मौसम में कम दिनों का होना और उन कम दिनों में जोरदार वर्षा का होना अब सामान्य सी बात हो गयी है.

बरसात की  इस अनियमितता के साथ-साथ तापक्रम में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है

यह भी अनुभव किया गया है कि खरीफ के मौसम में कई दिनों तक बादल बने रहते है जिससे धूप के अभाव  में पौधे ठीक से पैदावार देने में कठिनाई महसूस करते है.

इस तरह वर्ष- दर- वर्ष मौसम सोयबीन व अन्य फसलों के अनुकूल नहीं रह गया है.

अगर मौसम अनुकूल न हो तो हमें खेती के तरीकों  को प्रचलित मौसम के अनुकूल बनाना होगा

इस हेतु किसान भाइयों को कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं

  • फसल को सबसे अधिक नुकसान अतिवृष्टि अथवा फसल के दौरान लम्बे लम्बे सूखे के दौर पड़ने से होता है. इस समस्या से निपटने के लिए जो उपाय अपनाने  चाहिए वे इस प्रकार हैं
    • रबी की फसल काटने के बाद खेत को जोत कर गर्मी की धूप लगने को छोड़ देंइसके कई लाभों में से एक यह भी है कि वर्षा आने पर पानी जमीन में जाकर नमी लम्बे समय तक बनाये रखेगा।
    • खेत में खाद (ऍफ़वाईएम् / वर्म्मी कम्पोस्ट /मुर्गी की खाद ) नियमित रूप से उपलब्ध मात्रा के आधार पर डालेंअगर हर वर्ष न डाल पा रहे हैं तो एक वर्ष के अंतराल पर अवश्य डालें.
    • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब बोवनी का तरीका बदल लेंइस हेतू  या तो बीबीएफ अथवा एफआइआरबी  सीडड्रिल का उपयोग करें, बीबीएफ  सीडड्रिल के बारे में आपको पहले हम बता चुके है और एफआइआरबी  सीडड्रिल के बारे में अगले सन्देश में आपको जानकारी दी जाएगी
  1. बीबीएफ  सीडड्रिल का उपयोग करके आप चौड़ी पट्टी पर बोवनी करते हुए पट्टी के दोनों तरफ नाली निकाल सकते है.
  2. अगर एफआइआरबी  सीडड्रिल का उपयोग किया है तो मेड पर बुवाई होगी और आसपास नाली बनेगी. ऐसा करने से जमीन में जल संचय अधिक होगा और लम्बी तान पड़ने पर पौधों को आवश्यक नमी मिलती रहेगी
  3. वर्षा अधिक हुई तो पानी नाली में रहेगा अथवा उनसे उसका निकास हो सकेगा.
  4. अगर किसान भाई इस वर्षा जल के संचय की व्यवस्था कर लें तो उनके पास सूखे की स्थिति में सोयबीन की एक सिंचाई करने की सुविधा होगी या उस संचित जल को अगली फसल में उपयोग में ला सकेंगे।
  5. इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बोवनी हमेशा ढलान के विपरीत दिशा में हो.
    • संभव है कि किसानों के पास इस प्रकार की सीडड्रिल के व्यवस्था न होउनको सलाह है कि वे सोयाबीन बोअनी करने के बाद हर छटवीं व सातवीं कतार के बीच एक नाली निकल दें.      
    • अगर उपरोक्त सीडड्रीलों से बुवाई नहीं की गयी हो तो पानी की लम्बी तान पड़ने पर एक बार डोरा अवश्य चला दें।
    • अगर निन्दाई हाथ से की जा रही हो तो खरपतवार को मल्च के रूप में कतारों के बीच में डालकर करें. ध्यान रहे कि पहले निकले गए खरपतवरों के ऊपर दूसरी बार निकले गए खरपतवारों का जड़ वाला हिस्सा हो. ऐसा करने से जमीन में नमी अधिक समय तक रहेगी.
    • अगर दाना भरने की अवस्था में सूखे की स्थिति हो तो एक सिंचाई  अवश्य दें। 
  • फसल अवधि के दौरान कई दिनों तक धूप नहीं निकलती है, पौधें अपना उत्पाद बनाने के लिए समुचित प्रकाश का उपयोग कर सके इस हेतु कृपया कतार से कतार की दूरी 45 से. मी. रखे जिससे अधिक से अधिक मात्रा में प्रकाश पौधों पर पड़े.

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आज के इस एपिसोड में हम आपको भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान, इंदौर के द्वारा काली मिटटी के लिए विकसित किये गये ब्रॉड बेड फरो सीड ड्रिल नामक यंत्र के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं |

विगत वर्षो में वैश्विक मौसम में बदलाव को देखते हुए ऐसी तकनीकों का उपयोग जरुरी हो गया है जिनको अपनाने से सोयाबीन की उपज पर अनिश्चित मौसम का विपरीत असर को  कम से कम किया जा सके।

ऐसी हीं एक तकनीक बोवनी के तरीके में बदलाव लाने की है |

इस बोवनी की तकनीक को अपनाने से बरसात के मौसम में अतिवृष्टि अथवा अल्पवृष्टि, दोनों हीं दशाओ में फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है |

इस बोवनी की तकनीक को

अपनाने हेतु भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, खंडवा रोड इंदौर ने ब्रॉड बेड फरो नामक एक बोवनी यंत्र विशेषकर काली मिटटी में उपयोग के लिए विकसित किया है, जिसे बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल के नाम से भी जाना जाता है |

इस यन्त्र से बोवनी एक चौड़ी पट्टी होकर , जिसके आस पास दोनों तरफ नाली बन जाती है |

आइये अब हम आपको इस यन्त्र से बोवनी करने से होने वाले फायदों के बारे में जानकारी देते हैं |

  1. भूमि  की जल-धारण वृद्धि के साथ साथ अधिक उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है |
  2. बी.बी.ऍफ़. एक बहु-उपयोगी सीड ड्रिल है जिसमें बोवाई के समय बीज की गहराई घटाने बढाने की सुविधा दी गयी है , इस तकनीकी से बुवाई करने से बीज रपाता नहीं है |
  3. इस सीड ड्रिल में फसल के अनुसार बोवनी के लिए लाइन से लाइन की दूरी बदलने की सुविधा है, इसीलिए इसका उपयोग रबी एवं खरीफ दोनों हीं मौसमों में किया जा सकता है |
  4. इस सीड ड्रिल के उपयोग से खेत में बेड और नालियाँ बन जाते हैं और जिससे जमीन की नमी बढ़ती है व् वर्षा का अतिरक्त जल की खेत से निकासी हो जाती है अथवा उसका खेत के किनारे नाली बनाकर/ छोटा तालाब बनाकर संचित किया जाकर इसका उपयोग रबी की फसल में किया जा सकता है |
  5. इस सीड ड्रिल के उपयोग से भूमि के जलस्तर में वृद्धि होती है |

किसान भाइयों समतल विधि से बौनी करने में यदि फसल की अवधि में लम्बे लम्बे सूखे के दौर आने पर फसल को नुकसान से बचाना कठिन हो जाता है क्योंकि अधिकतर किसान बरानी खेती करते है |

दूसरी तरफ अतिवृष्टि होने पर खेत में पानी भरने से फसल को नुकसान होता है. अतः आप को सलाह है कि कृपया बोवनी के लिए बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल का उपयोग करें जिससे ऊपर बताई गयी अवस्थाओं में फसल तो नुकसान न हो |

बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल के साथ नौ दाते भी दिए जाते हैं जिनसे गेहूं और चने की बुवाई भी बड़ी आसानी से की जा सकती है |

बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल के साथ बीज को ढकने के लिए सीड कवरर की सुविधा यद्यपि वैकल्पिक है पर सलाह है कि उनका उपयोग अवश्य करें |

भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान द्वारा विकसित  यह बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल बेहद मजबूत होती है इसी लिए इसमें किसी प्रकार की टूट फूट की संभवाना नही के बराबर होती है |

बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल द्वारा बनने वाली नालियों की चौड़ाई भी आवश्यकतानुसार घटाई बधाई जा सकती है |

बी.बी.ऍफ़. सीड ड्रिल यंत्र को प्राप्त करने के लिए कार्यालय निदेशक भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान खंडवा रोड इंदौर मध्यप्रदेश में सम्पर्क किया जा सकता है |

संपर्क करने के लिए

एस टी डी कोड 0731 और टेलीफोन नम्बर 2476188,  2478414 पर बात करें

ईमेल भेजने का पता है  :-       soybean.director@icar.gov.in

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नमस्कार

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आज के इस एपिसोड में हम आपको भारतीय सोयाबीन अनुसन्धान संस्थान इंदौर के द्वारा विकसित किये गये सब्स्वॉयलर नामक यंत्र के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं

जैसा की आप जानते हैं कि सोयाबीन की खेती में नर्म भूमि की आवश्यकता होती है इसके लिए  भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान खंडवा रोड इंदौर ने मिटटी की कड़ी परत को तोड़ कर नर्म बनाने हेतु सब्स्वॉयलर नामक यंत्र को विकसित किया है |

सब्स्वॉयलर मशीन को मूल रूप से सोयाबीन के खेतों में नमी की कमी की भरपाई करने हेतु विकसित किया गया है

मूसलाधार वर्षा के कारण खेतों में जो जल जमाव हो जाता है जिससे एवं भू अपक्षरण होने लगता है और मिटटी की नमी धारण करने की क्षमता कम होने लगती है, सबसोयलर के प्रयोग से भूमि को ठीक करके मिटटी को नमी संरक्षित करने के लायक बनाया जा सकता है |

इस यंत्र के उपयोग से खेत में मिटटी की कड़ी परत को तोड़ कर नर्म बनाया जाता है और  वर्षा के जल का उपयोग करके पानी की भारी बचत भी की जा सकती है  

सबसोयलर यंत्र खेत अंदर कठोर परत को  24 इंच या उससे थोडा अधिक लगभग 30 इंच नीचे तक जाकर तोड़ने की क्षमता  रखता है  

आइये अब हम आपको सब्स्वॉयलर यंत्र के उपयोग से होने वाले लाभ के विषय में जानकारी देते हैं

  1. सब्स्वॉयलर कठोर मिट्टी की परत को तोड़ कर मिटटी के नर्म बनाता है , वर्षा जल से नमी का संचयन अच्छे तरीके से हो जाता है और सूखे की स्थिति से निपटने में आसानी होती है
  2. खेत में जल निकासी अच्छी हो जाती है और मिटटी में ओसमोसिस प्रक्रिया के द्वारा खनिजों की उपलब्धता बढ़ जाती है
  3. खेतो में भूमि के अंदर गहरी जड़ों वाले खरपतवारों का निबटारा आसानी से हो जाता है

सब्स्वॉयलर के सफल परिचालन एवं सर्वोतम परिणाम प्राप्त करने के लिए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं

रबी सीजन की फसल कटाई के बाद सब्स्वॉयलर का प्रयोग करके खेत को खुले छोड़ देना चाहिए ताकि वर्षा का  जल को खेत की मिटटी में ही अच्छे से अवशोषित हो जाए 

यदि प्रतिवर्ष ऐसा करना संभव नहीं है तो 2 या 3 वर्षों में कम से कम एक बार तो करना ही चाहिए एवं दूसरी और सामान्य खेतों की तैयारी का कार्य भी चलते रहना चाहिए

खनिजों से परिपूर्ण मिटटी जिसे वर्टिसोल भी कहते हैं  में सुगमता के साथ सफल संचालन हेतु 60     पी टी ओ हॉर्स पावर की क्षमता वाले ट्रैक्टर एवं नर्म मिट्टी के हेतु 50 पीटीओ हॉर्स पावर की क्षमता वाली ट्रैक्टर का प्रयोग करना चाहिए

सब्स्वॉयलर यंत्र काफी मजबूत है और इसके कलपुर्जों की अभिकल्पना सख्त जमीन में शीघ्र खराब ना होने वाली मशीन के रूप में की गयी है

सब्स्वॉयलर का वजन लगभग 200 किलोग्राम होता है और यह लगभग 30इंच की गहराई तक आसानी से जमीन में जा सकता है

सब्स्वॉयलर यंत्र को प्राप्त करने के लिए कार्यालय निदेशक भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान खंडवा रोड इंदौर मध्यप्रदेश में सम्पर्क किया जा सकता है|

संपर्क करने के लिए

एस टी डी कोड 0731 और टेलीफोन नम्बर 2476188,  2478414 पर बात करें

ईमेल भेजने का पता है  :-       soybean.director@icar.gov.in

किसान भाइयों एपिसोड के अंत में हम आपको मौसम के पूर्वानुमान की जानकारी देने जा रहे हैं

राज्य कृषि मौसम विज्ञान केंद्र भोपाल द्वारा तैयार विशेष बुलेटिन जिसे जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविधालय जबलपुर और राजमाता विजयराजे सिंधियां कृषि विश्वविधालय ग्वालियर एवं मध्यप्रदेश शासन के किसान कल्याण एवं कृषि विभाग भोपाल के संयुक्त तत्वाधान में दिनांक 12 मई  2020 को जारी किया गया है |

इसमें बताये गये मौसम के पूर्वानुमान के अनुसार आज 13 मई 2020 को चम्बल  और ग्वालियर संभाग के साथ , रीवा , शहडोल , जबलपुर , दमोह , सागर , टीकमगढ़ , सीहोर, , भोपाल, होशंगाबाद और बेतुल जिलों में अलग अलग स्थानों पर बिजली चमकने आंधी और गरज के साथ बौछारें पड़ने की संभावना है |

आपसे निवेदन है कि आपके फोन के मैसेज बॉक्स में हमने जो लिंक भेजा है, उसे कृपया आप अपने स्थानीय व्हाट्स एप्प ग्रुप में शेयर कर दें ताकि आपके माध्यम से यह महत्वपूर्ण सूचनाएं आपके क्षेत्र में जन जन तक पहुँच कर आम जन को लाभान्वित करें |

यदि आप स्वयं कोई स्थानीय व्हाट्सएप्प ग्रुप चलाते हैं तो हमारे कार्यालय के मोबाइल नंबर 9992220655 को उसमें शामिल कर लें हम आपके व्हाट्स एप्प ग्रुप में खेती बाड़ी , पशुपालन से जुडी जनोपयोगी सूचनाएं भेजेंगे जिससे आपके पंचायत क्षेत्र में आमजन को लाभ होगा |

हम आपको जो सन्देश उपलब्ध करवा रहे हैं आपको यह सन्देश कैसे लग रहे हैं इसके बारे में भी आप अपनी प्रतिक्रिया हमारे कार्यालय के ऊपर बताये हए नंबर पर व्हाट्सएप्प के माध्यम से भेज सकते हैं |

सॉलीडैरीडैड और विप्पी इंडस्ट्रीज लिमिटेड देवास की ओर से आपका हार्दिक धन्यवाद